धनगांव गोसाई में पेयजल संकट पर प्रशासन बनाम जमीनी हकीकत

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पीएचई विभाग ने खबर को बताया “भ्रामक”, ग्रामीण बोले– पानी के लिए आज भी भटक रहे लोग

कलेक्टर को भेजे प्रतिवेदन के बाद फिर उठा सवाल—आखिर सच क्या है?

जरहागांव (मुंगेली)। ग्राम धनगांव गोसाई में पेयजल संकट को लेकर उठे विवाद ने एक बार फिर प्रशासन और ग्रामीणों के बीच असल स्थिति को लेकर बड़ा अंतर उजागर कर दिया है। दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर को लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग (पीएचई) ने “भ्रामक और जमीनी हकीकत से परे” बताते हुए कलेक्टर को प्रतिवेदन भेजा है। विभाग का दावा है कि गांव में पेयजल की कोई समस्या नहीं है और हैंडपंप व सिंगल फेस पंपों से पर्याप्त जलापूर्ति हो रही है।

लेकिन जब लल्लूराम डॉट कॉम की टीम ने मौके पर पहुंचकर स्थिति का जायजा लिया तो ग्रामीणों की शिकायतें और जमीनी हालात विभागीय दावों से बिल्कुल अलग नजर आए।


ग्रामीणों का स्पष्ट दावा—“पानी की समस्या आज भी जस की तस”

गांव के लोगों ने दोबारा साफ कहा कि पेयजल संकट खत्म नहीं हुआ है। कई घरों तक नियमित पानी नहीं पहुंच रहा है, जिससे लोग आज भी परेशान हैं।

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ग्रामीणों के अनुसार गांव में दो बड़ी पानी टंकियां बनी हुई हैं, लेकिन इसके बावजूद सप्लाई व्यवस्था पूरी तरह सुचारू नहीं है। स्थिति यह है कि लोग मजबूरी में अलग-अलग स्रोतों पर निर्भर हैं।

ग्रामीणों का कहना है—

“समस्या तकनीकी हो या लापरवाही, हमें बस घर तक साफ पानी चाहिए।”


सरपंच ने भी मानी पानी की समस्या, उठाया बड़ा सवाल

ग्राम पंचायत सरपंच रामखिलावन नेताम ने भी माना कि गांव में पेयजल संकट वास्तविक रूप में मौजूद है। उन्होंने बताया कि—

  • गांव में कई ट्यूबवेल और बोरवेल हैं
  • लेकिन अधिकांश का पानी पीने योग्य नहीं है
  • लोग स्कूल परिसर स्थित बोरवेल पर निर्भर हैं

सरपंच ने सुझाव दिया कि स्कूल परिसर के बोरवेल में हाई एचपी मोटर लगाकर ओपन पाइपलाइन के माध्यम से मोहल्लों तक पानी पहुंचाया जाए।


जल जीवन मिशन की योजना बनी शोपीस

ग्रामीणों का आरोप है कि जल जीवन मिशन के तहत बनाई गई पाइपलाइन और पानी टंकियां लंबे समय से बंद पड़ी हैं।

लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी—

  • पाइपलाइनें चालू नहीं हो सकीं
  • टंकियों से नियमित सप्लाई नहीं हो रही
  • पूरी व्यवस्था ग्रामीणों के लिए उपयोगी साबित नहीं हो रही

ग्रामीणों का कहना है कि यदि सिस्टम को नियमित किया जाए या फिल्टर प्लांट लगाया जाए तो समस्या काफी हद तक खत्म हो सकती है।


पीएचई विभाग का पक्ष—“समस्या नहीं, योजना प्रगति पर”

पीएचई विभाग ने अपने प्रतिवेदन में कहा है कि ग्राम धनगांव गोसाई को खुड़िया समूह जल प्रदाय योजना में शामिल किया गया है, जिसका कार्य प्रगति पर है।

विभाग का यह भी कहना है कि—

  • योजना के कुछ हिस्से ग्रामीणों या अन्य कारणों से क्षतिग्रस्त हुए
  • जलागार के कुछ उपकरण चोरी हो गए
  • इसी कारण जल आपूर्ति प्रभावित हुई

विभाग का दावा है कि योजना पूरी होते ही गांव को स्थायी समाधान मिल जाएगा।


जमीनी सवाल—रिपोर्ट और हकीकत में फर्क क्यों?

खबर प्रकाशित होने के बाद विभाग ने इसे भ्रामक बताते हुए कलेक्टर को प्रतिवेदन भेज दिया, लेकिन सवाल वहीं खड़े हैं—

  • अगर गांव में पानी की समस्या नहीं है तो लोग पानी के लिए इकट्ठा क्यों हो रहे हैं?
  • स्कूल परिसर के बोरवेल पर इतनी निर्भरता क्यों है?
  • दो टंकियों के बावजूद घरों तक सप्लाई क्यों नहीं पहुंच रही?
  • लाखों खर्च के बाद भी जल जीवन मिशन ठप क्यों पड़ा है?

ग्रामीणों का आरोप है कि जमीनी स्थिति और विभागीय रिपोर्ट में बड़ा अंतर है।


खुड़िया जल प्रदाय योजना पर भी उठे सवाल

गांव को पहले से खुड़िया समूह जल प्रदाय योजना में शामिल किया गया था, इसके बावजूद अलग से सिंगल विलेज स्कीम पर भी खर्च हुआ।

अब सवाल उठ रहा है कि—

  • जब गांव पहले से बड़ी योजना में था तो अलग व्यवस्था क्यों बनाई गई?
  • लाखों रुपये खर्च का वास्तविक लाभ कहां गया?
  • योजना पूरी होने में और कितना समय लगेगा?
  • तब तक ग्रामीण पानी के लिए क्या करते रहेंगे?

जिला प्रशासन की पहल—फिल्टर प्लांट का प्रस्ताव

मामले की गंभीरता को देखते हुए जिला पंचायत सीईओ ने पीएचई विभाग को निर्देश दिए हैं कि डीएमएफ मद से गांव में फिल्टर मशीन प्लांट लगाने का प्रस्ताव तैयार किया जाए।

यह निर्णय इस बात का संकेत है कि प्रशासन भी गांव में पेयजल गुणवत्ता और उपलब्धता को लेकर समस्या को स्वीकार कर रहा है।


निष्कर्ष—कागजों की रिपोर्ट बनाम हकीकत की तस्वीर

धनगांव गोसाई की स्थिति एक बार फिर यह सवाल खड़ा करती है कि—

सरकारी योजनाओं का लाभ जमीन पर क्यों नहीं दिखता?

एक तरफ दो-दो पानी टंकियां खड़ी हैं, दूसरी ओर ग्रामीण पानी के लिए भटक रहे हैं। ऐसे में असली चुनौती सिर्फ योजनाएं बनाना नहीं, बल्कि उन्हें धरातल पर प्रभावी रूप से लागू करना है।

ग्रामीणों की आवाज अब सिर्फ एक मांग नहीं, बल्कि एक बड़ा प्रशासनिक सवाल बन चुकी है—
“पानी कब मिलेगा और कब तक सिर्फ रिपोर्टों में सब कुछ ठीक दिखाया जाएगा?”

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