(अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस विशेष) परंपरा और आधुनिकता का मिलन है स्वयं सेवा – डॉ० रूपेन्द्र कवि


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
रायपुर । हर वर्ष 05 दिसंबर को मनाया जाने वाला अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस केवल एक वैश्विक औपचारिकता नहीं , बल्कि मानव समाजों में निहित सहभागिता , सहयोग और सामुदायिक उत्तरदायित्व की उस परंपरा का आधुनिक उत्सव है , जो सभ्यता की शुरुआत से ही मानव जीवन का आधार रही है। स्वयंसेवा किसी भी समाज की सामाजिक शक्ति , सांस्कृतिक मूल्यों और नैतिक आधार का दर्पण है। संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा इसे वर्ष 1985 में स्थापित किया गया था , ताकि दुनियां भर में शांति , विकास और मानवीय सहयोग में योगदान देने वाले स्वयंसेवकों के प्रयासों का सम्मान किया जा सके। भारत में स्वयंसेवा की परंपरा अत्यंत प्राचीन है। मानवशास्त्रीय दृष्टि से देखें तो भारतीय समाज में “सेवा” केवल एक आचरण नहीं , बल्कि जीवन-दृष्टि का हिस्सा रही है। दान , परमार्थ , सामूहिक श्रमदान , अतिथि-सत्कार , भिक्षु-परंपरा , भक्ति आंदोलन का सामाजिक उत्थान — ये सभी हमारे सांस्कृतिक इतिहास में स्वयंसेवी भाव के उदाहरण हैं। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान स्वयंसेवा ने एक नया रूप लिया। गांधीजी के ‘सर्वोदय’, ‘नैतिक नेतृत्व’ और ‘सामुदायिक साझेदारी’ के विचारों ने सेवा को सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। आज आधुनिक भारत में आपदा प्रबंधन , रक्तदान , बाल एवं महिला कल्याण , पर्यावरण संरक्षण से लेकर स्वास्थ्य एवं शिक्षा तक — स्वयंसेवा विकास यात्रा का अभिन्न घटक बन चुका है। छत्तीसगढ़ , विशेषकर इसकी जनजातीय और ग्रामीण संरचना , स्वयंसेवा की जड़ों को और स्पष्ट करती है। गोंड़ , बैगा , मुरिया , हल्बा , धुरवा और अन्य अनेक आदिवासी समुदायों में परस्पर श्रमदान , सामूहिक निर्णय , पर्व-उत्सवों में सामूहिक योगदान और संकट में तुरंत सहायता करने की परंपरायें सदियों से जीवित हैं। बस्तर क्षेत्र में “घोटुल” जैसी संस्थायें , युवाओं में अनुशासन , समाज-सेवा और सामूहिक जिम्मेदारी का बोध कराती रही हैं।
किसी परिवार में विपत्ति आने पर पूरा गाँव श्रमदान करता है ; खेत बोने से लेकर घर बनाने तक में सहयोग को नैतिक दायित्व माना जाता है। यह स्वयंसेवा की सबसे शुद्ध सामाजिक संरचना है। समय के साथ सरकारें और संस्थायें स्वयंसेवा की भावना को योजनाओं के माध्यम से आगे बढ़ा रही हैं। छत्तीसगढ़ में इस दिशा में कुछ उल्लेखनीय पहलें सामने आई हैं जिसमें कोविड-19 के दौरान अनाथ या असहाय हुये बच्चों के लिये महतारी दुलार योजना एक सुरक्षा-कवच की तरह स्थापित की गई। राज्य सरकार इन बच्चों को निःशुल्क शिक्षा , स्कूल-प्रवेश में प्राथमिकता और कक्षा 1–8 के लिये 500 रूपये तथा 9–12वीं के लिये 1000 रूपये मासिक छात्रवृत्ति प्रदान करती है। यह योजना केवल आर्थिक सहयोग नहीं , बल्कि एक मानवीय संबल है , जो नैतिक रूप से समाज की सामूहिक जिम्मेदारी को राज्य-व्यवस्था के माध्यम से संस्थागत रूप देता है। वहीं महिलाओं के आर्थिक-सामाजिक सशक्तिकरण हेतु आरंभ की गई महतारी वंदन योजना के तहत पात्र महिलाओं को 1000 रूपये मासिक सहायता उपलब्ध कराई जाती है। बस्तर के कई दुर्गम और पूर्व में असुरक्षित क्षेत्रों में रहने वाली महिलायें पहली बार किसी सरकारी प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता से जुड़ी हैं। यह केवल वित्तीय समावेशन नहीं , बल्कि उनकी सामाजिक भागीदारी और सम्मान के नये अध्याय का आरंभ है। इन योजनाओं में दिखने वाली सुरक्षा , संवेदनशीलता और सहायता की भावना वह आधुनिक रूप है , जहाँ स्वयंसेवा भावना और शासन—दोनों मिलकर सामुदायिक विकास को गति देते हैं। बस्तर जहाँ दशकों तक सामाजिक चुनौतियाँ , भौगोलिक कठिनाइयाँ और विकास-अभाव जैसी स्थितियाँ बनी रहीं , आज स्वयंसेवा आधारित समुदायों और योजनाओं की सहायता से सकारात्मक परिवर्तन देख रहा है। युवाओं द्वारा शिक्षा में सहयोग , महिलाओं द्वारा सामुदायिक समूहों में सक्रिय भागीदारी , ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य जागरूकता , जंगलों की आग रोकने में सामूहिक प्रयास — ये सभी इस बात का प्रमाण हैं कि बस्तर अपने सामाजिक ताने-बाने में ‘सहयोग’ को जीवित रखे हुये है। यह मानवशास्त्रीय दृष्टि से विशेष रूप से महत्वपूर्ण है , क्योंकि किसी भी समाज की उन्नति केवल संसाधनों से नहीं , बल्कि समुदाय की “साझेदारी की क्षमता” से मापी जाती है।
मानवशास्त्रीय निष्कर्ष
मानवशास्त्रीय दृष्टि से स्वयंसेवा – परंपरा और आधुनिकता का मिलन है , सामाजिक पूँजी का निर्माण करता है , समुदाय – राज्य और व्यक्तिगत नैतिक जिम्मेदारी को जोड़ता है , बस्तर और छत्तीसगढ़ जैसे क्षेत्रों में सामाजिक स्थिरता और समग्र विकास का आधार बनता है। अंतर्राष्ट्रीय स्वयंसेवक दिवस हमें यह याद दिलाता है कि समाज का विकास केवल नीतियों से नहीं , बल्कि मानवता – संवेदना और सहभागिता से होता है। भारत और छत्तीसगढ़ की परंपरायें यह सिद्ध करती हैं कि स्वयंसेवा कोई नया विचार नहीं है , बल्कि हमारी सभ्यता की प्राचीन धरोहर है — जिसे आधुनिक समाज फिर से पहचान रहा है।



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