मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने दी पुरी शंकराचार्यजी के प्रयागराज प्रवास की जानकारी


अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
प्रयागराज । ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज अपनी राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के अंतर्गत गंगासागर प्रवास पूर्ण कर माघ महोत्सव के अवसर पर आज प्रयागराज पहुंच गये हैं। देश भर के सभी सनातनी भक्तवृन्दों को 17 जनवरी से 25 जनवरी 2026 तक माघ मेला क्षेत्र में उनका पावन सानिध्य सुलभ रहेगा। उपरोक्त दिवसों में प्रतिदिन प्रात:कालीन सत्र में साढ़े ग्यारह बजे से दर्शन , संगोष्ठी एवं दीक्षा तथा सायं पांच बजे से हिन्दूराष्ट्र धर्मसभा में सत्संग लाभ पूज्य शंकराचार्यजी के दिव्य वाणी से शिविर स्थल पर सुलभ होगा। शिविर स्थल माघ मेला क्षेत्र में सेक्टर – 04 , पान्टून पुल संख्या – 02 , त्रिवेणी मार्ग , तुलसी चौराहा पर स्थित है। इसकी जानकारी श्री सुदर्शन संस्थानम , पुरी शंकराचार्य आश्रम / मीडिया प्रभारी अरविन्द तिवारी ने दी। बताते चलें कि राष्ट्रोत्कर्ष अभियान के अंतर्गत प्रति वर्ष शंकराचार्यजी का पूरे भारतवर्ष एवं नेपाल आदि देशों में प्रवास निर्धारित रहता है। गुरुपूर्णिमा के पश्चात श्रीगोवर्द्धमठ पुरी , ओड़ीसा में चातुर्मास्य में प्रात: , सायं तथा रात्रि के सत्रों में अध्यापन तथा धर्मोपदेश , देश के विभिन्न क्षेत्रों में श्रीगोवर्द्धनमठ से संबद्ध आश्रम जैसे प्रयागराज के झूंसी क्षेत्र में स्थित शिवगंगा आश्रम , काशी के अस्सी घाट के समीप स्थित दक्षिणेश्वर मूर्ति आश्रम , होशियारपुर स्थित मां विमलाम्बा देवी आश्रम , श्रीधाम वृन्दावन क्षेत्र में स्थित हरिहर आश्रम , मिथिलांचल के जन्मस्थली में स्थित देवी मां का मंदिर परिसर एवं छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में स्थित श्री सुदर्शन संस्थानम् , रावांभाठा प्रमुख है। जहां पर राष्ट्रोत्कर्ष अभियान में महाराजश्री के प्रवास के समय अंचल के भक्तजन आध्यात्मिक संदेश से लाभान्वित होते हैं। पूज्य शंकराचार्यजी अपने आध्यामिक संदेशों में युवाओं के लिये गठित संगठन आदित्यवाहिनी से सम्बद्ध होने के लिये आवश्यक योग्यता एवं व्यक्तित्व निर्माण के संबंध में उद्घृत करते हैं कि ऐसे युवा जिनका जीवन संयत हो , सर्वहित की भावना से भावित हो , साथ ही साथ दर्शन , विज्ञान और व्यवहार तीनों दृष्टियों से सनातन सिद्धान्त की उपयोगिता को ख्यापित करने की क्षमता हो और व्यक्तित्व की व्याहमोह ना हो। सङ्गठन को मुख्य स्थान दें ; सद्भावपूर्ण संवाद , सेवा और सङ्गठन तीनों को महत्व दें। वे ही आदित्य वाहिनी से संबद्ध होकर राष्ट्र के लिये उपयोगी बनकर सनातन सिद्धान्त समन्वित हिन्दू राष्ट्र निर्माण में सहभागी हो सकते हैं। इसी तरह सनातन धर्म में वर्णाश्रम व्यवस्था के सार के संबंध में सूत्रात्मक रूप मेंसंकेत करते हैं कि पूर्व गुण – कर्मानुसार वर्तमान शरीर प्राप्त हुआ है , शरीर की सीमा में वर्ण प्राप्त है , वर्ण की सीमा में आश्रम प्राप्त है , वर्णाश्रम की सीमा में पुनः कर्म आश्रम प्राप्त है ; पूर्व गुण – कर्मानुरूप वर्तमान शरीर , शरीर – सापेक्ष वर्ण है , वर्ण – सापेक्ष आश्रम है , वर्णाश्रम – सापेक्ष पुनः कर्म व्यवस्था है ; यही इसकी सर्वकालीन एवं सर्वोत्कृष्ट प्रासंगिकता है।



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