संवैधानिक नैतिकता के नाम पर धार्मिक प्रथाओं को खारिज करना खतरनाक: सबरीमाला मामले में केंद्र का पक्ष
नई दिल्ली । केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को लेकर चल रहे विवाद में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दायर पुनर्विचार याचिकाओं का समर्थन करते हुए स्पष्ट किया है कि यह मामला केवल लैंगिक समानता का नहीं, बल्कि धार्मिक आस्था और परंपरा से जुड़ा है।
सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई से पहले केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता के माध्यम से दाखिल हलफनामे में कहा गया कि धार्मिक प्रथाओं को आधुनिकता, तर्कसंगतता या वैज्ञानिकता के आधार पर परखना न्यायिक अतिक्रमण होगा। इससे न्यायपालिका अपने विचार धर्म के आंतरिक सिद्धांतों पर थोप सकती है, जो संविधान की भावना के अनुरूप नहीं है।
धार्मिक प्रथाओं की समीक्षा की सीमा तय करने की मांग
केंद्र सरकार ने कहा कि किसी धार्मिक प्रथा की “आवश्यकता” तय करने का अधिकार अदालत के बजाय संबंधित धार्मिक संप्रदाय के पास होना चाहिए। अदालत केवल उन्हीं मामलों में हस्तक्षेप करे, जहां सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, नैतिकता या मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो।
हलफनामे में यह भी कहा गया कि न्यायाधीश न तो धार्मिक ग्रंथों की व्याख्या करने के लिए प्रशिक्षित हैं और न ही धार्मिक-थियोलॉजिकल मुद्दों का अंतिम निर्णय देने के लिए संस्थागत रूप से सक्षम हैं।
अयप्पा स्वरूप से जुड़ी परंपरा
केंद्र ने अपने जवाब में कहा कि सबरीमाला में भगवान अयप्पा की पूजा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ स्वरूप में की जाती है और महिलाओं के प्रवेश पर परंपरागत प्रतिबंध इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ा हुआ है। इसे भेदभाव के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि आस्था और परंपरा के रूप में समझा जाना चाहिए।
‘संवैधानिक नैतिकता’ पर भी उठाए सवाल
केंद्र सरकार ने ‘संवैधानिक नैतिकता’ की अवधारणा को अस्पष्ट बताते हुए कहा कि इसका उपयोग कर धार्मिक प्रथाओं को बदलना न्यायिक प्रक्रिया के दायरे से बाहर है। ऐसा करना न्यायपालिका द्वारा अप्रत्यक्ष रूप से संविधान संशोधन जैसा होगा।
सरकार ने यह भी कहा कि अदालतें अपने दृष्टिकोण से धर्म में परिवर्तन न करें, क्योंकि इससे न्यायाधीशों की व्यक्तिगत सोच हावी हो सकती है और धार्मिक आस्था प्रभावित हो सकती है।
व्यापक संवैधानिक बहस का रूप
केंद्र के अनुसार, सबरीमाला विवाद अब केवल मंदिर प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक संवैधानिक बहस बन चुका है, जिसमें यह तय होना है कि धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा क्या होनी चाहिए।
केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि इस मामले में संतुलित दृष्टिकोण अपनाते हुए आस्था, परंपरा और संवैधानिक मूल्यों के बीच सामंजस्य स्थापित किया जाए।

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