स्वास्थ्य विभाग के आदेश हवा में: पचपेड़ी में ज्वाइनिंग से इनकार, मस्तूरी में जमे दिव्यांग बाबू — अफसरों की चुप्पी पर उठे गंभीर सवाल
रिपोर्टर ✒️ रूपचंद रॉय
बिलासपुर/पचपेड़ी। स्वास्थ्य विभाग में प्रशासनिक आदेशों की खुलेआम अवहेलना का सनसनीखेज मामला सामने आया है। संभागीय संयुक्त संचालक द्वारा जारी स्पष्ट पदस्थापना आदेश के बावजूद सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी ने पचपेड़ी सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में कार्यभार नहीं संभाला है। हैरानी की बात यह है कि संबंधित कर्मचारी अब भी मस्तूरी स्वास्थ्य केंद्र में नियमित रूप से काम कर रहा है, जबकि कागजों में उसकी तैनाती पचपेड़ी में है। इस दोहरे रवैये से न सिर्फ विभागीय अनुशासन तार-तार हो रहा है, बल्कि पचपेड़ी CHC की व्यवस्थाएं भी चरमरा गई हैं।
आदेश जारी, पालन शून्य: क्या है पूरा प्रकरण?
संभागीय संयुक्त संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं बिलासपुर के कार्यालय से 17 मार्च 2026 को आदेश क्रमांक जारी कर श्री कृष्ण कुमार साहू (दिव्यांग श्रेणी) को पदोन्नति देते हुए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र लुतरा से हटाकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र पचपेड़ी में सहायक ग्रेड-02 के पद पर पदस्थ किया गया था। नियमानुसार आदेश जारी होने के 7 से 15 दिन के भीतर नवीन पदस्थापना स्थल पर ज्वाइन करना अनिवार्य होता है।
तीन सप्ताह बाद भी नहीं पहुंचे पचपेड़ी
विश्वस्त सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, आदेश जारी हुए तीन सप्ताह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन श्री साहू ने आज दिनांक तक पचपेड़ी CHC में अपनी आमद दर्ज नहीं कराई है। चौंकाने वाली बात यह है कि वे प्रतिदिन सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मस्तूरी पहुंचकर वहां के लिपिकीय कार्य निपटा रहे हैं। विभागीय रिकॉर्ड में पचपेड़ी की कुर्सी खाली है, लेकिन मस्तूरी में एक ‘अतिरिक्त’ बाबू काम कर रहा है।
पचपेड़ी CHC की हालत: फाइलों का अंबार, मरीज परेशान
पचपेड़ी स्वास्थ्य केंद्र में पहले से ही स्टाफ की कमी है। सहायक ग्रेड-2 का पद रिक्त होने से दवाओं के स्टॉक रजिस्टर, जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, वेतन आहरण, CMHO रिपोर्ट और अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजी कार्य बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि काम का दबाव बढ़ गया है और आम जनता को प्रमाण पत्र व अन्य कार्यों के लिए बार-बार चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
बीएमओ का विवादित तर्क: ‘जरूरत नहीं, इसलिए रोक लिया’
इस पूरे मामले पर जब सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र मस्तूरी के खंड चिकित्सा अधिकारी (BMO) से पक्ष जानना चाहा गया तो उन्होंने चौंकाने वाला बयान दिया। BMO ने कहा, “जी हां, उनकी पदस्थापना पचपेड़ी में हुई है। लेकिन वर्तमान में पचपेड़ी में उनकी आवश्यकता नहीं है, इसलिए मौखिक निर्देश पर उन्हें यहीं कार्य करने को कहा गया है। हमने इसकी सूचना वरिष्ठ कार्यालय को भेज दी है।”
नियमों की धज्जियां: मौखिक आदेश से कैसे चलेगा विभाग?
BMO के इस बयान ने कई गंभीर प्रशासनिक सवाल खड़े कर दिए हैं:
क्या मौखिक आदेश का कोई महत्व है? छत्तीसगढ़ सिविल सेवा नियमों के तहत किसी भी कर्मचारी का पदस्थापना स्थल बदलने के लिए लिखित संशोधन या निरस्तीकरण आदेश अनिवार्य है। मौखिक निर्देश पर किसी को रोका जाना नियम विरुद्ध है।
आदेश जारी क्यों हुआ? यदि पचपेड़ी CHC में सहायक ग्रेड-2 की ‘जरूरत नहीं’ थी, तो संभागीय कार्यालय ने वहां पदस्थापना आदेश जारी ही क्यों किया? क्या बिना रिक्ति और आवश्यकता का आंकलन किए आदेश निकाला गया?
जवाबदेही किसकी? आदेश की अवहेलना पर न तो संबंधित कर्मचारी के खिलाफ कोई नोटिस जारी हुआ, न ही BMO से स्पष्टीकरण मांगा गया। क्या विभागीय अनुशासन केवल कागजों तक सीमित है?
दिव्यांग श्रेणी की आड़ या प्रशासनिक लापरवाही?
श्री साहू दिव्यांग श्रेणी से आते हैं। नियमों के तहत उन्हें पदस्थापना में सुविधाजनक स्थान देने का प्रावधान है। लेकिन सवाल यह है कि यदि मस्तूरी उनके लिए सुविधाजनक था, तो आदेश में सीधे मस्तूरी ही क्यों नहीं लिखा गया? पचपेड़ी का आदेश निकालकर फिर मौखिक रूप से मस्तूरी में रोकना, पूरी प्रक्रिया को संदिग्ध बनाता है।
अब पूरे मामले पर स्वास्थ्य विभाग के उच्च अधिकारियों की चुप्पी चर्चा का विषय बनी हुई है। देखना यह होगा कि संभागीय संयुक्त संचालक इस खुली अवहेलना पर संज्ञान लेते हैं या फिर ‘जरूरत नहीं’ का मौखिक तर्क विभागीय आदेशों पर भारी पड़ता रहेगा। पचपेड़ी की जनता और स्टाफ को कब तक एक बाबू का इंतजार करना पड़ेगा, यह बड़ा सवाल है।

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