अमरकंटक में साल बोरर बीमारी का बढ़ते प्रकोप पर विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को और आचार्य रामकृष्णानंद जी महाराज ने जताई गहरी चिंता


संवाददाता / श्रवण उपाध्याय
अमरकंटक। माँ नर्मदा जी की उद्गम स्थली / पवित्र नगरी अमरकंटक अमरकंटक में इस समय एक गंभीर पर्यावरणीय संकट पनप रहा जिससे पूरा जंगल क्षेत्र चपेट की कगार में है । क्षेत्र के सघन साल वनों में *साल बोरर* नामक कीटजनित बीमारी तेजी से फैल रही है , जिसके कारण हजारों साल के वृक्ष सूखकर गिरने लगे हैं । यह स्थिति अमरकंटक के पारिस्थितिक संतुलन और हरियाली दोनों के लिए गंभीर खतरा बन गई है ।

वन परिक्षेत्र के कपिलधारा , कबीर चबूतरा , खुरखुरी दादर , जोहिला और मैकल पर्वत श्रृंखला के इलाके में बड़ी संख्या में साल वृक्ष प्रभावित हो चुके हैं । यह बीमारी वृक्ष के तने में छेद कर भीतर से लकड़ी को नष्ट कर देती है , जिससे वृक्ष के तने से बुरादा निकलने लगता है और वह शीघ्र ही सूख जाता है।
क्षेत्रीय विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने सरकार और वन विभाग पर उठाए सवाल
अनूपपुर जिले के पुष्पराजगढ़ विधानसभा क्षेत्र के विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने साल बोरर महामारी पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि यह केवल एक वन रोग नहीं बल्कि अमरकंटक की पर्यावरणीय पहचान पर संकट है ।
उन्होंने कहा —
> “इस बीमारी से अमरकंटक के वन क्षेत्र में लगभग ढाई से तीन लाख साल वृक्षों की कटाई करनी पड़ सकती है । यह बेहद चिंताजनक है । सवाल यह उठता है कि जब साल बोरर का संक्रमण फैल रहा था , तब वन विभाग क्या कर रहा था? ऐसा लगता है कि विभाग गहरी नींद में था ।”
विधायक मार्को ने कहा कि लगभग 27 वर्ष पूर्व भी इस बीमारी ने असर दिखाया था , परंतु तब इतना बड़ा नुकसान नहीं हुआ था । इस बार स्थिति कहीं अधिक भयावह दिखाई दे रही है । उन्होंने कहा कि —
> “सरकार को तुरंत वैज्ञानिक और ठोस कदम उठाने होंगे । पिछली बार हुए नुकसान की भरपाई आज तक नहीं हो पाई है । साल वृक्षों का पुनरोपण नहीं किया गया , जबकि यही वृक्ष अमरकंटक की शीतलता और पर्यावरण संतुलन के प्रतीक हैं । अगर साल वृक्ष न बचे तो अमरकंटक का स्वरूप ही बदल जाएगा।”
आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी रामकृष्णानंद जी महाराज ने बताया कि ‘पेड़ पौधे ही तीर्थों की शोभा हैं’ । पवित्र नगरी अमरकंटक स्थित मार्कंडेय आश्रम के आचार्य महामंडलेश्वर 1008 स्वामी रामकृष्णानंद जी महाराज ने भी साल बोरर महामारी पर गहरी चिंता व्यक्त की है । उन्होंने कहा कि यह केवल एक वन समस्या नहीं बल्कि धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी चिंतनीय है ।
आचार्य महामंडलेश्वर जी ने कहा
> “तीर्थ स्थलों की शोभा उनके पेड़-पौधों और हरियाली से ही होती है। ये वृक्ष हमें शुद्ध प्राणवायु प्रदान करते हैं और अमरकंटक के जंगलों में अनेक दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियाँ पाई जाती हैं । साल वृक्ष पर्यावरण के संतुलन को बनाए रखते हैं और इनके कारण क्षेत्र में नमी और शीतलता बनी रहती है । यही साल वृक्ष अमरकंटक की सौंदर्यता का आधार हैं।”
उन्होंने आगे कहा कि इस महामारी के चलते लाखों साल (सरई) के वृक्षों की कटाई से अमरकंटक का पर्यावरणीय संतुलन डगमगा जाएगा ।
> “यही समस्या लगभग 27 वर्ष पूर्व हुए साल वृक्षों की कटाई का असर आज भी दिखाई देता है । अब फिर वही स्थिति बन रही है । वन विभाग को वैज्ञानिक तरीकों से त्वरित और सघन उपचार कराना चाहिए । हम सरकार से निवेदन करते हैं कि इस विषय पर तुरंत ठोस कार्रवाई करे ताकि अमरकंटक की हरियाली और जीवनदायिनी वनसंपदा सुरक्षित रह सके ।”
वन विभाग की निष्क्रियता पर उठ रहे सवाल
स्थानीय नागरिकों और पर्यावरणप्रेमियों का कहना है कि साल बोरर संक्रमण की शुरुआती पहचान के बावजूद विभाग की ओर से समय पर रोकथाम नहीं की गई । अब यह बीमारी व्यापक रूप से फैल चुकी है और हजारों वृक्ष पहले ही सूख चुके हैं ।
पर्यावरण संतुलन और नमी पर खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि साल के वृक्ष न केवल पर्यावरण को संतुलित रखते हैं बल्कि भूजल स्तर को बनाए रखने , तापमान नियंत्रित करने और मिट्टी को क्षरण से बचाने में भी अहम भूमिका निभाते हैं । इन वृक्षों के नष्ट होने से क्षेत्र की नमी , हरियाली और शीतलता पर गंभीर असर पड़ेगा ।
वैज्ञानिक उपचार और पुनरोपण की आवश्यकता
वन वैज्ञानिकों का सुझाव है कि साल बोरर संक्रमण को रोकने के लिए जैविक कीटनाशकों , फ्यूमिगेशन , संक्रमित वृक्षों के सुरक्षित निस्तारण और नई पौधारोपण योजना पर तत्काल काम शुरू किया जाए ।
अमरकंटक की हरियाली बचाना समय की मांग
अमरकंटक केवल एक तीर्थ नहीं बल्कि भारत की प्राकृतिक और पर्यावरणीय धरोहर का प्रतीक है । साल वृक्षों के नष्ट होने से यह पवित्र भूमि अपने मूल स्वरूप को खो सकती है । क्षेत्र के संत समाज , जनप्रतिनिधि और नगर वासी एकमत हैं कि सरकार और वन विभाग को इस विषय पर तत्काल ठोस कदम उठाने होंगे ताकि “हरित अमरकंटक” की पहचान सदैव बनी रहे ।



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