एम्स रायपुर ने दर्ज किया अपना पहला बाल चिकित्सा मृत अंग दान
साहस और मानवता की एक अनूठी मिसाल पेश करते हुए, रायपुर की 13 वर्षीय सुमाना कुंडू के परिवार ने गंभीर न्यूरोलॉजिकल (तंत्रिका संबंधी) जटिलताओं के बाद उन्हें ब्रेन डेड (मस्तिष्क मृत) घोषित किए जाने पर अंगदान की सहमति दी। उनके इस निस्वार्थ निर्णय ने अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), रायपुर में दो जीवन रक्षक किडनी ट्रांसप्लांट (गुर्दा प्रत्यारोपण) को सफल बनाया, जिससे एंड-स्टेज किडनी रोग से पीड़ित मरीजों को नया जीवन और नई उम्मीद मिली है। यह बच्ची पिकनोडाईसोस्टोसिस (Pyknodysostosis) से पीड़ित थी, जो एक बेहद दुर्लभ अनुवांशिक विकार (जेनेटिक डिसऑर्डर) है। इस बीमारी में हड्डियां असामान्य रूप से घनी लेकिन बेहद कमजोर हो जाती हैं। बचपन से ही वह गंभीर इंट्राक्रैनियल हाइपरटेंशन (मस्तिष्क के भीतर अत्यधिक दबाव) से जूझ रही थी, जिसके लिए उनके मस्तिष्क में वेंट्रिकुलोपेरिटोनियल (वीपी) शंट डाला गया था। बीते वर्षों में, शंट के बार-बार खराब होने के कारण उनकी कई सर्जिकल रीविज़न (दुरुस्तीकरण) की गईं, और अंततः सेकेंडरी ऑप्टिक एट्रोफी के कारण उनकी आंखों की रोशनी हमेशा के लिए चली गई। वह एम्स रायपुर में न्यूरोलॉजी और न्यूरोसर्जरी टीमों के सहयोग से बाल रोग विभाग (पीडियाट्रिक्स) की विशेष देखरेख में थीं। 29 मई, 2026 को गंभीर न्यूरोलॉजिकल जटिलताओं के कारण उन्हें पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर यूनिट (पिकू) में भर्ती कराया गया था। बहुविषयक (मल्टीडिसीप्लिनरी) मेडिकल टीम के गहन उपचार और निरंतर प्रयासों के बावजूद, उनकी स्थिति बिगड़ती गई और अंततः उन्हें ब्रेन डेड घोषित कर दिया गया।
इस कठिन घड़ी में, ट्रांसप्लांट कोऑर्डिनेटर अंबे पटेल और विनीता पटेल ने शोक संतप्त परिवार को मृत अंगदान के बारे में परामर्श दिया। अद्भुत करुणा और संवेदनशीलता का परिचय देते हुए, परिवार ने दोनों किडनियां दान करने की सहमति दे दी। इसके बाद, स्थापित प्रतीक्षा सूची नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (सोटो-छत्तीसगढ़) के माध्यम से अंगों का आवंटन किया गया।
दान की गई एक किडनी रायपुर के एक 15 वर्षीय लड़के को प्रत्यारोपित की गई, जो पिछले तीन वर्षों से डायलिसिस पर निर्भर था, जबकि दूसरी किडनी मध्य प्रदेश के बालाघाट के एक 45 वर्षीय मरीज को दी गई, जो पिछले पांच वर्षों से डायलिसिस करा रहे थे। दोनों ट्रांसप्लांट प्रक्रियाएं पूरी तरह सफल रहीं और दोनों प्राप्तकर्ता किडनी ट्रांसप्लांट आईसीयू में तेजी से स्वस्थ हो रहे हैं।
इस जटिल सर्जिकल ट्रांसप्लांट को यूरोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. अमित आर. शर्मा, डॉ. दीपक बिस्वाल और डॉ. राघवेंद्र ने नेफ्रोलॉजी टीम (जिसमें डॉ. विनय राठौर और डॉ. नीलम मरावी शामिल थे) और एनेस्थिसियोलॉजी टीम (जिसका नेतृत्व प्रो. मोनिका खेत्रपाल और डॉ. सरिता रामचंद्रानी कर रही थीं) के साथ मिलकर अंजाम दिया। यह ऐतिहासिक चिकित्सा उपलब्धि बाल रोग, नेफ्रोलॉजी, यूरोलॉजी, एनेस्थिसियोलॉजी, न्यूरोसर्जरी, फॉरेंसिक मेडिसिन विभागों और सोटो-छत्तीसगढ़ के आपसी और सुचारू समन्वय के प्रयासों से ही संभव हो सकी।
इस बड़ी चिकित्सा उपलब्धि पर प्रकाश डालते हुए डॉ. विनय राठौर ने कहा कि यह एम्स रायपुर में आठवां मृत अंगदाता अंगदान था और संस्थान का पहला बाल चिकित्सा (पीडियाट्रिक) मृत अंगदान था। उन्होंने आगे बताया कि एम्स रायपुर अब तक कुल 99 किडनी ट्रांसप्लांट कर चुका है, जिसमें मृत दाताओं से प्राप्त 14 किडनियां शामिल हैं, और यह प्रक्रिया संस्थान का तीसरा पीडियाट्रिक किडनी ट्रांसप्लांट है।
एम्स रायपुर के कार्यकारी निदेशक, लेफ्टिनेंट जनरल अशोक जिंदल (सेवानिवृत्त) ने कुंडू परिवार के इस निर्णय की सराहना की और इसे करुणा व सामाजिक जिम्मेदारी का एक प्रेरणादायक उदाहरण बताया। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अंगदान एक ऐसा शक्तिशाली माध्यम है जो कई जिंदगियां बचा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने जटिल ट्रांसप्लांट प्रक्रियाओं के प्रबंधन में एम्स रायपुर की बढ़ती विशेषज्ञता की भी पुष्टि की।
मानवता के प्रति परिवार के इस असाधारण और अभूतपूर्व योगदान के सम्मान में मृत किशोरी को संस्थान द्वारा औपचारिक ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ (सलामी) दिया गया। उनकी यह अनमोल विरासत उन लोगों के जीवन के माध्यम से हमेशा जीवित रहेगी जिन्हें उन्होंने एक नया जीवन दिया है।

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