बड़ादेव महापूजन व ईशर गौरी-गौरा पूजन में उमड़ी आस्था, लोक संस्कृति से सजी बारात बनी आकर्षण का केंद्र

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रिपोर्टर ✒️ मनमोहन सिंह राजपूत

खैरा । विकासखंड कोटा अंतर्गत ग्राम पंचायत खैरा में आदिवासी लोक संस्कृति, सामाजिक एकजुटता और पारंपरिक आस्था को सहेजते हुए कुल देवता बड़ादेव महापूजन एवं ईशर गौरी-गौरा पूजन का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम में गोंडी संस्कृति, सभ्यता और परंपराओं की जीवंत झलक देखने को मिली।

विधि-विधान से हुआ प्राकृतिक अनुष्ठान

पूजन की शुरुआत विधि-परंपरा अनुसार प्राकृतिक अनुष्ठान और मिट्टी लाने की रस्म से हुई। उसी पवित्र मिट्टी से गौरी-गौरा की आकर्षक प्रतिमाएं गढ़ी गईं। पारंपरिक साज-सज्जा से सुसज्जित मंडप में विवाह रस्में संपन्न कराई गईं, जिसमें आदिवासी संस्कृति की मौलिक पहचान स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आई।

लोक गीत-संगीत के साथ निकली बारात

पूजन उपरांत गाजे-बाजे और लोक गीतों के साथ पारंपरिक बारात निकाली गई। गीत-संगीत की धुन पर थिरकते महिला-पुरुष, युवा और बच्चे बारात में शामिल हुए। पूरा गांव उत्सवमय माहौल में रंगा नजर आया और यह दृश्य आदिवासी लोक संस्कृति की समृद्ध विरासत का सजीव उदाहरण बना।

विधायक ने बताया परंपरा का महत्व

कार्यक्रम में उपस्थित कोटा विधायक अटल श्रीवास्तव ने अपने उद्बोधन में कहा कि बड़ादेव महापूजन एवं ईशर गौरी-गौरा पूजन आदिवासी समाज की प्राचीन और गौरवशाली परंपरा है। ऐसे आयोजनों से न केवल संस्कृति और सभ्यता संरक्षित होती है, बल्कि सामाजिक एकता और भाईचारा भी मजबूत होता है।
उन्होंने सामाजिक कार्यक्रमों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मंगल भवन निर्माण हेतु 10 लाख रुपए की घोषणा भी की, जिसे समाजजनों ने करतल ध्वनि से स्वागत किया।

जनप्रतिनिधियों की रही उपस्थिति

कार्यक्रम की अध्यक्षता ग्राम सरपंच सुश्री सुकृता पोर्ते एवं जगन्नाथ सिंह आर्मो (अध्यक्ष, गोंडवाना सोसायटी केंद्र खैरा) ने की।
विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला पंचायत सदस्य श्रीमती रजनी पिंटू मरकाम, यासीन खान, कृष्णा साहू, संतोष साहू, मिथिलेश दास मानिकपुरी सहित अनेक जनप्रतिनिधि एवं गणमान्य नागरिक मौजूद रहे।

समाजजनों का रहा सराहनीय योगदान

आयोजन को सफल बनाने में कृष्णा पोर्ते, रामजी राज, कैलाशचंद्र पोर्ते, सतपाल पोर्ते, शिवकुमार राज, बलराम पोर्ते, शत्रुघ्न मरकाम, सरजू पोर्ते, मोती जगत, रामपाल पोर्ते, बिसाहू पोर्ते सहित बड़ी संख्या में समाजजनों की सक्रिय सहभागिता रही।

पूरे आयोजन ने यह संदेश दिया कि आदिवासी लोक परंपराएं केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सांस्कृतिक पहचान और सामूहिक चेतना का मजबूत आधार हैं, जिन्हें आने वाली पीढ़ियों तक जीवंत रखना सभी की साझा जिम्मेदारी है।

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