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डॉ. हरगोविंद सिंह खुराना की 104 वीं वर्षगांठ पर एक दिवसीय व्याख्यान का आयोजन

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मुंगेली । नवीन शासकीय कन्या महाविद्यालय मुंगेली में भारतीय मूल के प्रसिद्ध अमेरिकी जैव रसायनज्ञ डॉ. हरगोविंद सिंह खुराना जी की 104 वीं वर्षगांठ पर एक दिवसीय व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि प्राचार्य डॉ. प्राची सिंह एवं मुख्य वक्ता राजेश कुमार घोसले (विभागाध्यक्ष प्राणिशास्त्र) रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता वरिष्ठ प्राध्यापक मदन लाल कश्यप एवं संचालन जितेंद्र कुमार शर्मा ने किया। कार्यक्रम की शुरूआत मां सरस्वती की वंदना एवं खुराना जी के छायाचित्र पर माल्यार्पण करके की गई। मुख्य वक्ता राजेश कुमार घोंसले ने अपने उद्बोधन में कहा कि डॉ. हरगोविंद खुराना जी का जन्म 9 जनवरी 1922 को अविभाजित भारत के मुल्तान जिले के रायपुर गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। आज हम उनकी 104 वीं वर्षगांठ पर आनुवंशिकी के क्षेत्र में उनके क्रांतिकारी कार्य के उन्हें याद कर रहे हैं। उन्होंने जेनेटिक कोड को डिकोड करने और पहला कृत्रिम जीन बनाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने लाहौर के डीएवी कॉलेज से बीएससी और एमएससी की डिग्री प्रथम श्रेणी में प्राप्त की। छात्रवृत्ति मिलने पर 1946 में वे इंग्लैंड के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में प्रो. टॉड के मार्गदर्शन में अपना शोध कार्य पूरा किया। वे 1952 में कनाडा के कोलंबिया विश्वविद्यालय में जैव रसायन विभाग के प्रमुख बने। 1960 में अमेरिका के विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के एंजाइम रिसर्च इंस्टीट्यूट में महानिदेशक बने। खुराना जी ने जेनेटिक कोड पर शोध किया, जिसमें मार्शल निरेनबर्ग और रॉबर्ट होली ने सहयोग दिया। उन्होंने डीएनए के न्यूक्लियोटाइड्स (A, C, G, T) के क्रम से प्रोटीन संश्लेषण की प्रक्रिया स्पष्ट की। 1970 में उन्होंने खमीर जीन की पहली कृत्रिम प्रतिलिपि बनाई, जो जैव-आनुवंशिकी की नींव बनी। घोसले ने अपने वक्तव्य में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित भारतीय वैज्ञानिकों के बारे में विस्तार से बताया कि सर्वप्रथम 1913 में रवीन्द्रनाथ टैगोर को साहित्य, डॉ. सी. वी. रमन को भौतिकी में रमन प्रभाव के लिये, 1968 में डॉ. हर गोविंद सिंह खुराना को चिकित्सा एवं शरीर विज्ञान में जेनेटिक कोड के लिए, मदर टेरेसा को शांति के लिये, सुब्रह्मण्यन चंद्रशेखर को भौतिकी, अमर्त्य सेन को अर्थशास्त्र, वेंकटरामन रामकृष्णन को रसायन विज्ञान, एवं कैलाश सत्यार्थी को शांति का नोबेल पुरस्कार मिला। खुराना जी को भारत सरकार द्वारा 1969 में पद्म भूषण, लूशिया ग्रॉस हॉर्विट्ज पुरस्कार, गार्डनर फाउंडेशन अवार्ड, एल्बर्ट लास्कर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने अपने जीवन के अंतिम वर्षों में एमआईटी में प्रोफेसर के रूप में कार्य किया। 9 नवंबर 2011 को अमेरिका में आनुवांशिकी और जैव प्रौद्योगिकी के आधार स्तंभ पंचतत्व में विलीन हो गए। प्राचार्य डॉ. प्राची सिंह ने अपने वक्तव्य में कहा कि डॉ. हर गोविंद सिंह खुराना जी जैव प्रौद्योगिकी के आधार स्तंभ एवं आनुवांशिकी क्षेत्र के दैदीप्यमान नक्षत्र हैं। उन्होंने अपने कठिन परिश्रम और लगन से यह सिद्ध किया कि सीमित संसाधनों से भी विश्व स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है। उनका योगदान न केवल जैव विज्ञान के लिए, बल्कि सम्पूर्ण मानव समाज के लिए अमूल्य है। अंत में आभार प्रदर्शन संयोजक राजेश कुमार घोसले ने किया। समस्त प्राध्यापक श्रीमती प्रेमा केरकेट्टा, सुरेंद्र कुमार तिग्गा, अविनाश राठौर, डॉ. शशांक शर्मा, डॉ. डेजी रानी दिवाकर, मनोरमा भास्कर, डॉ. डिंपल बंजारा, डॉ. मधु यामिनी सोनी, नीतू राजपूत, विनीता साहू, वीरेन्द्र देवांगन एवं कार्यालयीन कर्मचारी गण बलराम यादव, जगन्नाथ जांगड़े, अश्विनी चंद्राकर, इंदु बाला बंजारे, सुशीला अनंत, कलावती और बड़ी संख्या में छात्राओं ने उपस्थित होकर इस कार्यक्रम को सफल बनाया।

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