पुरी शंकराचार्यजी पहुंचे वृंदावन , होली तक प्रवास निर्धारित
• अरविन्द तिवारी की रिपोर्ट
वृंदावन – ऋग्वेदीय पूर्वाम्नाय श्रीगोवर्द्धनमठ पुरीपीठाधीश्वर अनन्तश्री विभूषित श्रीमज्जगद्गुरु शंकराचार्य पूज्यपाद स्वामी श्रीनिश्चलानन्द सरस्वतीजी महाराज इन दिनों अपनी राष्ट्रोत्कर्ष अभियान अंतर्गत श्रीधाम वृन्दावन में प्रवास पर हैं , जहां उनका प्रवास होली तक निर्धारित है। गौरतलब है कि पुरी शंकराचार्यजी पारंपरिक रूप से प्रति वर्ष होली एवं शरद पूर्णिमा के अवसर पर हरिहर आश्रम चैतन्य विहार वृन्दावन में विराजित रहते हैं।
इस अवधि में प्रति दिवस पूर्वान्ह साढ़े ग्यारह बजे से आयोजित दर्शन , दीक्षा एवं संगोष्ठी में उपस्थित भक्तजन अपनी धर्म , राष्ट्र तथा अध्यात्म से संबंधित जिज्ञासाओं का वैदिक सिद्धान्त अनुरुप समाधान स्वयं शंकराचार्य के श्रीमुख से प्राप्त कर सकेंगे। वहीं सायं सत्र में पांच बजे से धर्मसभा में महाराजश्री का आध्यात्मिक संदेश श्रवण का सौभाग्य सुलभ होगा। सम सामयिक विषयों पर वक्तव्य के क्रम में राष्ट्र प्रमुख की विशेषताओं की चर्चा करते हुये उद्घृत करते हैं कि राजा वह है जिसको वृक्षों की वेदना व्याप्ति हो , पर्वतों की वेदना व्याप्ति हो , चींटी – चिड़ियों की वेदना व्याप्ति हो।
इनको तो गाय की वेदना नहीं व्याप्ति , वेद की वेदना नहीं व्याप्ति। स्थावर – जङ्गम प्राणियों में चींटी – पतंग इन सबका विलोप क्यों। चींटी – चिड़ियों की वेदना आजकल कौन सुने , महायंत्र के युग में वो तो मुर्दाबाद भी नहीं कर सकती। बेचारे वृक्षों की वेदना कौन सुने , वो आह भी नहीं कर सकते। वर्तमान राष्ट्रीय परिदृश्य के संबंध में कथन है कि बच्चों को , युवकों को दिशाहीन करने का भरपूर प्रयास किया जा रहा है। धर्म और ईश्वर को , विकास में परिपंथी या अवरोधक माना जा रहा है। भारत में शिक्षा की प्रणाली भी अपनी नहीं है। उसमें धर्म , नीति , अध्यात्म का कोई सन्निवेश नहीं है। रक्षा की प्रणाली भी भारत को अपनी सुलभ नहीं है। कृषि , गोरक्ष्य , वाणिज्य के प्रकल्प भी विदेशियों की ओर से चरितार्थ हैं और सेवा के प्रकल्प भी। संविधान की आधारशिला भी सनातन सिद्धान्त के सर्वथा विपरीत है। यदि किसी के जीवन में कोई दिव्यता है तो समझना चाहिये कि पूर्वजन्मों में उसने मनुस्मृति के अनुसार अवश्य ही आचरण किया होगा।
कोई भी दिव्यता , वैदिक संविधान को माने बिना उसका अनुपालन किये बिना सम्भव ही नहीं है। इसी कड़ी में पुरी शंकराचार्यजी कारक कोटि के विभूतियों पर दृष्टांत देते हैं कि कारक – कोटी के जो व्यक्ति होते हैं , वो शब्दब्रह्म – परब्रह्म में निष्णात होने पर भी उनको जो दायित्व प्राप्त होता है कटनी — छंटनी आदि का , उसमें वो संलग्न रहते हैं। उपशम उनके जीवन में बाहर से परिलक्षित नहीं होता। लोक संग्रह में लगे हुये महानुभाव तो सबके हित का मार्ग प्रशस्त करते ही हैं , कारक – कोटि के जो महानुभाव होते हैं ; परशुरामजी इत्यादि , वो कटनी – छंटनी इत्यादि में भी संलग्न रहते हैं।

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