दाऊपारा में बीमार गौ-वंश तड़पता रहा, प्रशासन और ‘गौ-सेवकों’ की संवेदनहीनता उजागर

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मुंगेली। गौ-सेवा के नाम पर सक्रियता के दावे करने वाले तंत्र की पोल उस वक्त खुल गई, जब नगर के दाऊपारा क्षेत्र में एक बेसहारा गौ-वंश दो दिनों तक बीमार हालत में सड़क पर तड़पता रहा और जिम्मेदार महकमा मूकदर्शक बना रहा। इस घटना ने न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि तथाकथित गौ-सेवकों की सक्रियता पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।

पशु चिकित्सालय की उदासीनता उजागर

स्थानीय नागरिकों ने बताया कि गाय की बिगड़ती हालत को देखते हुए तत्काल पशु चिकित्सालय को सूचना दी गई, लेकिन वहां से “वाहन उपलब्ध नहीं है” कहकर पल्ला झाड़ लिया गया। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या विभाग के पास आपात स्थिति में पशु उपचार हेतु बुनियादी संसाधन भी उपलब्ध नहीं हैं।

हेल्पलाइन भी साबित हुई नाकाम

शासन द्वारा संचालित 1962 हेल्पलाइन, जिसे बीमार पशुओं के लिए त्वरित सहायता का माध्यम बताया जाता है, वह भी इस मामले में पूरी तरह विफल साबित हुई। नागरिकों ने कई बार संपर्क करने की कोशिश की, लेकिन न तो कॉल का समुचित जवाब मिला और न ही कोई राहत पहुंची।

गौ-सेवा के नाम पर दिखावा

घटना के बाद शहर में उन संगठनों के खिलाफ आक्रोश है, जो गौ-सेवा के नाम पर सक्रिय होने का दावा करते हैं। लोगों का कहना है कि जब वास्तविक सेवा की आवश्यकता होती है, तब ये संगठन या तो गायब हो जाते हैं या संसाधनों की कमी का हवाला देते हैं। इससे यह साफ होता है कि कई स्थानों पर गौ-सेवा केवल प्रचार और दिखावे तक सीमित रह गई है।

व्यवस्था पर उठे सवाल, जिम्मेदारी तय करने की मांग

दो दिनों तक एक बेजुबान पशु का तड़पना प्रशासनिक लापरवाही का प्रमाण माना जा रहा है। स्थानीय नागरिकों ने मांग की है कि इस मामले की जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाए और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो, इसके लिए ठोस व्यवस्था बनाई जाए।

फिलहाल, यह घटना मुंगेली में प्रशासनिक संवेदनहीनता और दिखावटी गौ-सेवा की हकीकत को उजागर करती है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार तंत्र इस पर क्या ठोस कदम उठाता है।

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