डिजिटल साक्ष्य जांच में पुलिस को मिला अत्याधुनिक प्रशिक्षण

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रिपोर्टर ✒️ रूपचंद रॉय

बिलासपुर। डिजिटल अपराधों की बढ़ती चुनौती से निपटने और विवेचना को मजबूत बनाने के उद्देश्य से बिलासपुर जिले में Search, Seizure, Preservation of Electronic Evidence and Cyber Forensics विषय पर एक दिवसीय रेंज स्तरीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। यह कार्यशाला पुलिस महानिरीक्षक बिलासपुर रेंज डॉक्टर संजीव शुक्ला (IPS) के निर्देश पर आयोजित की गई, जिसमें बिलासपुर रेंज के 8 जिलों के राजपत्रित अधिकारियों, विवेचकों, रेंज साइबर थाना एवं ACCU के अधिकारियों ने भाग लेकर प्रशिक्षण प्राप्त किया।

कार्यशाला में राज्य फॉरेंसिक प्रयोगशाला, छत्तीसगढ़ रायपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. विक्रांत सिंह ठाकुर ने विषय विशेषज्ञ के रूप में प्रशिक्षण प्रदान किया। उन्होंने डिजिटल एविडेंस कलेक्शन, सर्च एवं सीजर की प्रक्रिया, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के संरक्षण तथा साइबर फॉरेंसिक जांच की बारीकियों पर विस्तार से जानकारी दी।

प्रशिक्षण के दौरान बताया गया कि सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79क के अंतर्गत केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा अधिसूचना जारी कर राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला रायपुर को इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य परीक्षक के रूप में अधिकृत किया गया है। इसके साथ ही अब रायपुर स्थित फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी में हाईटेक साइबर फॉरेंसिक एवं ऑडियो-वीडियो फॉरेंसिक प्रयोगशाला की सुविधा भी प्रारंभ हो चुकी है, जो मध्य भारत की एकमात्र NABL सर्टिफाइड प्रयोगशाला है।

इस सुविधा के प्रारंभ होने से डिजिटल साक्ष्यों की जांच के लिए अन्य राज्यों पर निर्भरता समाप्त हो गई है। अब कंप्यूटर, लैपटॉप, पेन ड्राइव, मोबाइल, ई-मेल, मैसेज, ऑडियो-वीडियो फाइलों से जुड़े मामलों की जांच रायपुर एफएसएल में ही संभव हो सकेगी।

कार्यशाला के शुभारंभ अवसर पर वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक बिलासपुर रजनेश सिंह (IPS) ने कहा कि आधुनिक युग में अपराध और अपराधी दोनों डिजिटल हो चुके हैं। विवेचना में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, किंतु यह साक्ष्य अत्यंत नाजुक होते हैं, जिनका संकलन और संरक्षण पूरी सावधानी से किया जाना आवश्यक है। समीक्षा के दौरान यह सामने आया है कि इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के अभाव में कई मामलों में अपराधी दोषसिद्ध नहीं हो पाते। उन्होंने प्रशिक्षण प्राप्त अधिकारियों से अपेक्षा की कि वे जिलों में अन्य पुलिस कर्मियों को भी इस विषय का प्रशिक्षण दें।

पुलिस महानिरीक्षक डॉक्टर संजीव शुक्ला ने अपने उद्बोधन में कहा कि राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला रायपुर अब सेंट्रल इंडिया की एकमात्र ऐसी प्रयोगशाला बन गई है, जिसे सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 की धारा 79क के तहत प्रमाणन प्राप्त है। पहले जिन जांचों के लिए चंडीगढ़ या भोपाल पर निर्भर रहना पड़ता था, वे सभी अब रायपुर एफएसएल में ही संभव होंगी।

उन्होंने बताया कि मोबाइल फॉरेंसिक के अंतर्गत स्मार्टफोन, टैबलेट से डेटा रिट्रीव करना, क्लाउड डेटा विश्लेषण, डिलीट किए गए डेटा को पुनः प्राप्त करना, पासवर्ड ब्रेक करना, क्षतिग्रस्त मोबाइल से डेटा सुरक्षित निकालना, ऑडियो-वीडियो फॉरेंसिक में वॉइस मैचिंग, फेस मैचिंग, कंप्यूटर डिस्क फॉरेंसिक में हार्ड डिस्क व SSD से डिलीट डेटा रिकवरी तथा संदिग्ध दस्तावेजों की जांच जैसे कार्य अब रायपुर एफएसएल में किए जा सकेंगे।

डॉ. शुक्ला ने कहा कि वर्तमान समय में अपराधों के खुलासे और अपराधियों को सजा दिलाने में डिजिटल फॉरेंसिक एक बड़ा हथियार है। पुलिस का मूल्यांकन भी अधिक से अधिक मामलों में दोषसिद्धि के आधार पर होगा, जिसके लिए इलेक्ट्रॉनिक और फॉरेंसिक साक्ष्यों का अधिकतम उपयोग आवश्यक है। प्रशिक्षण के बाद राजपत्रित अधिकारियों एवं थाना प्रभारियों को मास्टर ट्रेनर के रूप में जिलों में अन्य अधिकारियों को प्रशिक्षण देने के निर्देश दिए गए।

कार्यशाला के दौरान अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मधुलिका सिंह, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर राजेन्द्र जायसवाल, जोनल पुलिस अधीक्षक दीपमाला कश्यप, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक ग्रामीण डॉ. अर्चना झा, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सक्ती हरीश यादव, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक सारंगढ़-बिलाईगढ़ निमिषा पाण्डेय, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक मुंगेली नवनीत कौर छाबड़ा, वरिष्ठ वैज्ञानिक अधिकारी डॉ. विक्रांत सिंह ठाकुर तथा क्षेत्रीय विज्ञान प्रयोगशाला बिलासपुर के प्रभारी अधिकारी डॉ. रवि चंदेल प्रमुख रूप से उपस्थित रहे।

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